स्त्री का मोह छोड़ना है?
"तुम सोचते हो स्त्री का मोह छोड़ना है?..
रुको। पहले ये समझ लो - जिसे तुम मोह कहते हो, वह मोह नहीं है। वह तुम्हारी अपनी ही ऊर्जा है। और वह ऊर्जा तुम्हें नहीं छोड़ेगी, क्योंकि वह तुम हो ही।
अब सुनना मेरी बात।"
"एक बात समझ लो - तुम जिस स्त्री के पीछे दौड़ रहे हो, वह स्त्री बाहर नहीं है। वह तुम्हारे भीतर है। ये जो तुम्हारी आँखें हैं, ये बाहर नहीं देखतीं... ये तुम्हारे मन का प्रोजेक्शन देखती हैं।
जिस दिन तुम्हें ये समझ आ जाएगा कि तुम किसी स्त्री से चिपके नहीं हो, बल्कि अपनी ही कल्पना से चिपके हो - उसी दिन मोह टूट जाएगा। मैं कहता हूँ टूट जाएगा। पर तुम ये नहीं सुनना चाहते। तुम तो चाहते हो कि मैं तुम्हें कोई तरकीब बता दूँ... कोई जप... कोई तप... पर नहीं। कोई तरकीब काम नहीं करती।"
"सुनो मेरी बात ध्यान से।
एक बार एक आदमी मेरे पास आया। बड़ा परेशान था। बोला - 'ओशो, मैं एक स्त्री को छोड़ नहीं पा रहा। दिन-रात वही ख्याल आता है। मैं भागता हूँ तो वह और पीछे आती है।'
मैंने उससे पूछा - 'तुमने कभी देखा है कि तुम जिस वक्त उसके बारे में सोचते हो, उस वक्त तुम्हारे भीतर क्या होता है?'
वह बोला - 'आग लगी रहती है। बेचैनी होती है।'
मैंने कहा - 'यही आग तुम्हारी दुश्मन नहीं है। यही आग तुम्हारी मित्र है। यही वही ऊर्जा है जो बुद्ध को ज्ञान दे गई, जो महावीर को मौन दे गई। बस तुमने उस ऊर्जा को एक ही दिशा दे दी है - स्त्री के शरीर की तरफ। इतना ही गलत किया है तुमने।'
वह चौंक गया। बोला - 'तो मैं क्या करूँ?'
मैंने कहा - 'कुछ मत करो। बस उस ऊर्जा को होने दो। उससे लड़ो मत। बस साक्षी बनो। देखो वह कैसे उठती है, कैसे गिरती है। और एक दिन तुम पाओगे - वही ऊर्जा तुम्हारी रीढ़ में सर्पिणी बनकर ऊपर चढ़ गई। और तुम... तुम आज़ाद हो गए।'"
"ये समझो - जो तुम्हें खींच रहा है, वह स्त्री नहीं है। वह तुम्हारी अपनी अधूरी प्यास है। और वह प्यास बाहर से नहीं बुझती। बाहर से तो कुछ पल का धोखा मिलता है - फिर वही प्यास, वही बेचैनी।
सच्ची बात ये है - तुम किसी स्त्री से नहीं चिपके हो। तुम अपनी ही छाया से चिपके हो। जिसे तुम प्रेम समझ रहे हो, वह प्रेम नहीं है। वह एक बीमारी है। प्रेम तो मुक्ति है। और ये जो तुम कर रहे हो, ये तो कैद है।
मैं ये नहीं कहता कि स्त्री से दूर भागो। भागने से कुछ नहीं होता। जिससे भागोगे, वही पीछा करेगी। मैं कहता हूँ - पूरे प्रेम से उसमें उतरो, लेकिन साक्षी बनकर। जैसे कोई फूल को सूँघता है - आनंद लेता है, पर उस फूल पर मरता नहीं।"
"आज रात कोई एक प्रयोग करके देखो।
बैठो। आँखें बंद करो। और जो भी ख्याल आए - उसे आने दो। उससे लड़ो मत। न कहो - 'ये गलत है।' न कहो - 'ये पाप है।' बस एक गहरी साँस लो। और देखो वह ख्याल कहाँ से उठ रहा है। तुम हैरान रह जाओगे - वह तुम्हारी रीढ़ के निचले हिस्से से उठता है। वहाँ एक ऊर्जा सोई पड़ी है। बस उसे जगा दो। और उसे ऊपर की तरफ बढ़ने दो।
21 दिन करके देखो। कुछ खोना नहीं है। और हाँ - जब वह ऊर्जा ऊपर पहुँच जाएगी, तो वही स्त्री तुम्हें दिखेगी... पर तब वह देवी लगेगी। शरीर नहीं।"
"बस इतना समझ लो - जिससे मुक्ति चाहिए, उसी में पूरा उतरो। आधे-अधूरे उतरने से मोह बनता है। पूरे उतरने से... वहाँ तो सिर्फ तुम हो, वहाँ तो सिर्फ आनंद है।"
"अब एक बात और...
ये जो मैंने तुमसे कहा, ये सिर्फ सुनकर मत छोड़ना। सुनकर भूल जाना, ये तो वैसा ही है जैसे नदी के किनारे खड़े होकर प्यास बुझाने की कोशिश करना।
जाओ, आज रात ये प्रयोग करके देखो। बैठो। अपने भीतर उतरो। और जो अनुभव हो, वो मुझे बताना।
हाँ... और ध्यान रखना - मैं यहाँ हर रोज तुम्हारे लिए आता हूँ। पर तब, जब तुम मुझे अपने अंदर बुलाओगे।
इस चैनल को ऐसे ही मत छोड़ना... जुड़े रहना। क्योंकि अभी बहुत कुछ और कहना बाकी है।
और हाँ - जिसे लगता है ये बात उसके किसी काम की है, उसे ये वीडियो भेज देना। कोई और तो समझाएगा नहीं।
बस... अब जाओ और थोड़ा अपने भीतर झाँक कर आओ।"
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